one of the first ghazals that I memorized, by Saleem Kaushar Sahib
मैं ख्याल हूँ किसी और का, मुझे सोचता कोई और है
सरे-आइना मेरा अक्स है, पसे-आइना कोई और है
मैं किसी के दस्ते-तलब में हूँ, किसी के हर्फे-दुआ में हूँ
मैं नसीब हूँ किसी और का, मुझे मांगता कोई और है
अजब ऐतबार-ओ-बे ऐतबारी के दरम्यान है जिन्दगी
मैं करीब हूँ किसी और के मुहे जानता कोई और है
मेरी रौशनी तेरी खद्दो-खाल से मुख्तलिफ तो नही मगर
तू करीब आ तुझे देख लूँ तू वही है या कोई और है
तुझे दुश्मनों की ख़बर न थी मुझे दोस्तों का पता नही
तेरी दास्ताँ कोई और थी मेरा वाक्या कोई और है
वही मुन्सिफों की रिवायते वही फैसलों की इबारतें
मेरा जुर्म तो कोई और था पर मेरी सज़ा कोई और है
कभी लौट आयें तो पूछना नही देखना उन्हें गौर से
जिन्हें रास्ते में ख़बर हुई की ये रास्ता कोई और है
जो मेरी रियाज़ते-नीम-शब् को "सलीम" सुबह न मिल सकी
तो इसके मानी तो ये हुए की यहाँ खुदा कोई और है
http://aligarians.com/2006/02/main-khayaal-huun-kisii-aur-kaa-mujhe-sochataa-koii-aur-hai/
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